1993 में आया ये क्लासिक Game Doom अब वैज्ञानिक प्रयोगों में इस्तेमाल हो रहा है। बैक्टीरिया, सैटेलाइट कंप्यूटर और लैब में उगाए गए न्यूरॉन्स पर भी यह गेम चलाकर रिसर्च की जा रही है।
1993 में रिलीज हुआ क्लासिक कंप्यूटर Game Doom उसे समय शेख मनोरंजन का साधन माना जाता था लेकिन तीन दशक के बाद फिर यही गेम वैज्ञानिकों के लिए एक दिलचस्प रिसर्च टूल बन गयाहै। आज या गेम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, न्यूरॉन्स और बायोलॉजी जैसे क्षेत्रों में प्रयोग किया जा रहा है। हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों और तकनीक विशेषज्ञों ने इस गेम को कई आसमान प्लेटफार्म पर चला कर दिखाया है: यहां तक की बैक्टीरिया, सैटेलाइट और लाइव में उगाए गए न्यूरॉन्स भी इस गेम को खेल चुके हैं।
न्यूरॉन्स को सिखाया गया Game Doom खेलना
ऑस्ट्रेलिया में स्थित बायोटेक कंपनी Cortical लैब्स के वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक दिलचस्प प्रयोग किया है, और शोधकर्ताओं ने सिलिकॉन चिप पर उगे गए न्यूरॉन्स को इस गेम को खेलने के लिए प्रशिक्षित किया गया।
सच में शामिल वैज्ञानिक Alon Loeffler के अनुसार, टीम ने इस गेम को इसलिए चुना क्योंकि इंटरनेट पर लंबे समय से एक लोकप्रिय सवाल पूछा जाता है कि क्या यह डिवाइस Doom चला सकता है? इससे पहले 2021 में इसी टीम ने न्यूरॉन्स को क्लासिक गेम Pong खेलना सिखाया था और Doom का वातावरण ज्यादा कठिन होने के कारण इसे अगला कदम माना गया।
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Can It Run Doom?
इंटरनेट पर लोकप्रिय बना समय के साथ-साथ “Can It Run Doom” और “It Runs Doom” जैसे सेंटेंस इंटरनेट पर एक मीन बन गया था। इसका मतलब है कि यदि कोई डिवाइस इस गेम को चला सकता है तो उसकी तकनीकी क्षमता काफी मजबूत मानी जाती है।
यही कारण है कि डेवलपर्स और वैज्ञानिकों के बीच एक खास तरह की सब कलर विकसित हो गई है जिसमें लोग इस गेम को अलग-अलग डिवीजन पर चलने की कोशिश करते हैं अब तक इसे कैलकुलेटर डिजिटल प्रेगनेंसी टेस्ट और कई और प्रकार के छोटे-छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पर भी चला कर दिखाया जा चुका है।
विज्ञान में खेल और रचनात्मकता की भूमिका
ऑस्ट्रेलिया के यूनिवर्सिटी ऑफ़ तस्मानिया में पीएचडी कर रहे सॉफ्टवेयर के डेवलपर Mars Buttfield Addision के अनुसार यह ट्रेन विज्ञान में खेल और रचनात्मक महत्व को और अधिक दर्शाता है। उनका कहना है कि शोधकर्ता जब मजेदार प्रयोग करते हैं तो वही रचनात्मक सोच विकसित होती है जो जटिल वैज्ञानिक समस्याओं को हल करने में मदद करती है। उनके मुताबिक कभी-कभी मजेदार या अजीब लगने वाले प्रयोग भी उतना ही मेहनत रंग लाती है जितना कोई तकनीकी शोध।
अन्य Video गेम में भी बना रहा है रिसर्च टूल
वैज्ञानिक अनुसंधान में वीडियो गेम का उपयोग केवल Doom तक ही सीमित नहीं है जैसे की लोकप्रिय गेम Minicraft का इस्तेमाल AI मॉडल को विकसित करने के लिए और टेस्ट करने के लिए किया जा चुका है। इसी तरह और ऑनलाइन मल्टीप्लेयर गेम जैसे World Of Warcraft का उपयोग बीमारी फैलने के पैटर्न को समझने और महामारी के सिमुलेशन के लिए किया गया है।
Doom पर रिसर्च क्यों है खास
विशेषज्ञों के अनुसार Doom वैज्ञानिकों के लिए इसलिए भी यह आकर्षक लग रहा है क्योंकि 1997 में इसके डेवलपर John Carmack ने इसका सोर्स कोड इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दिया था उसे समय वह टेक्सास स्थित कंपनी आईडी सॉफ्टवेयर में काम कर रहे थे। उसके कोड सार्वजनिक होने के कारण डेवलपर और शोधकर्ता इसे अलग-अलग प्लेटफार्म के लिए आसानी से संशोधित कर सकते हैं। इसको चलाने के लिए बहुत ज्यादा डिवाइस में स्टोरेज या शक्तिशाली हार्डवेयर की जरूरत नहीं होती।
बैक्टीरिया पर भी दिखाए गए गेम का फ्रेम
अमेरिका के कैंब्रिज में स्थित Massachusertts Institute ऑफ Technology में बायोलॉजिकल इंजीनियर Lauren Ren Ramlan ने भी इस गेम को अपने रिसर्च में इस्तेमाल किया। 2023 में उन्होंने Escherichia coli बैक्टीरिया की मदद से Doom के शुरुआती कुछ प्रेम प्रदर्शित किए गए इसके लिए उन्होंने बैक्टीरिया में फ्लोरोसेंट प्रोटीन जोड़ा जिससे कोशिकाएं स्क्रीन के ब्लैक एंड व्हाइट पिक्सल की तरह व्यवहार करने लगी। इसके बाद गेम के शुरुआती फ्रेम को ब्लैक एंड व्हाइट रूप में बदलकर बैक्टीरिया की प्लेट को पैटर्न से मिलाया गया।
निष्कर्ष
आज से 3 दशक पहले सिर्फ एक वीडियो गेम के रूप में शुरू हुआ Doom आज विज्ञान और तकनीक के प्रयोग का अन्य अनोखा पैटर्न बन चुका है। न्यूरॉन्स बैक्टीरिया और सैटेलाइट जैसे प्लेटफार्म पर भी इसके प्रयोग यह दिखाता है की रचनात्मक सोच और प्रयोग धर्मिता विज्ञान को नए आयाम दे सकती है।
